तेत्तिरीय उपनिषद

कृष्ण याजुर्ववेद के तेत्तिरिये अरुणायंक के सांतवे, आंठ्वे और नौवे अध्याय शिला वल्ली, ब्रह्मानंद वल्ली तथा भृगु वल्ली का नाम तेत्तिरीय उपनिषद दूसरी व तीसरी वल्ली में विशुद्ध ब्रह्म विधा का निरूपण किया गया है|

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स्कन्द उपनिषद

यह उपनिषद कृष्ण याजुर्ववेद से संभंधित है | इसमें यह बताया गया है की विष्णु और शिव में कोई भेद नहीं है तथा शिव और जीव में भी कोई भेद नहीं है | शरीर को मंदिर माना है तथा अध्यात्म दर्शन को व्यवहारिक बनाने की दिशा दी गयी है |

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शिव्संकल्पोप्निषद

यह उपनिषद शुक्ल याजुर्ववेद के अध्याय ३४ के मंत्र १ से ६ में वर्णित है |इस उपनिषद में मनन को शुभ संकल्पों से युक्त करने की कामना की गयी है |

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निरालम्ब उपनिषद

यह उपनिषद शुक्ल याजुर्ववेद से संभंधित है | इसमें ब्रह्मा, ईश्वर, जीव, प्रकृति, जगत, ज्ञान, कर्म, स्वर्ग-नरक आदि का विवेचन किया गया है |इसमें कुल चालीस मंत्र हैं |

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मुण्डक उपनिषद

यह उपनिषद अथर्ववेद के अंतर्गत  है | इसमें तीन मुण्डक हैं तथा प्रत्येक मुण्डक में 2-2 खण्ड हैं | कुल ६४ मंत्र हैं | मुण्डक शब्द का भावार्थ ” मन का मुंडन कर अविधा से मुक्त करने वाला ज्ञान ” है |

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माण्डूक्य उपनिषद

यह उपनिषद अर्थववेद के अंतर्गत आता है | इसमें “ॐकार” को अक्षरब्रह्म का सम्भोधन सिद्ध करते हुए उनके विभिन्न चरणों एवं मात्राओं का विवेचन किया गया है |

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केनोपनिषद

यह उपनिषद सामवेदिये “तलवकार ब्राह्मण” का नवां अध्याय है | इस उपनिषद का प्रारंभ प्रश्न “केन इन्षित..? (यह जीवन किसके द्वारा प्रेरित हुआ है ? ” से हुआ है | इसलिए इसको केन उपनिषद कहा गया है |

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कठोपनिषद

यह उपनिषद कृष्णयजुर्वेद के कठशाखा के अंतर्गत आती है | इस उपनिषद में यमराज और नचिकेता के मध्य संवाद द्वारा ब्रह्म ज्ञान का वर्णन किया गया है |

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अम्रुतनाद उपनिषद्

यह उपनिषद् कृष्णा यजुर्वेद से सम्भंदित है | इस उपनिषद् में प्रणव की उपासना तथा योग के छह अंगों – प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, प्राणायाम, तर्क, समाधी आदि का वर्णन किया गया है |

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